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रूढ़िवाद का विरोधी कवि- अल-मारी

अबुल अला-अल-मारी, प्रसिद्ध नेत्रहीन अरबी कवि/दार्शनिक, जिन्होंने उलामा, धर्म-विज्ञानियों और रूढ़िवादियों का, अपने निहित स्वार्थों के लिए इस्लाम/धर्मग्रन्थों को जनमानस से दूर रखने के लिए विरोध करते हुए कट्टरपंथ और धार्मिक उन्माद/अतिवादी विचारों का प्रतिरोध किया तथा इन सब में कभी भरोसा नहीं किया। यह कवि जिहाद के माध्यम से धर्म-तंत्र के विस्तार हेतु इस्लामी रूढिवादियों द्वारा दरकिनार किए गए धर्मनिरपेक्ष/जनोन्मुखी मूल्यों का समर्थन करता रहा।

परम्पराओं की आलोचना तथा समझ का समर्थन करते हुए अल-मारी कहता हैः-

‘परम्पराएं भूतकाल से आती है और यदि उनमें सत्यता होती है, तो वे महत्वपूर्ण होंगी;

परम्पराओं के शुरूआती कारणों का पता लगाएं, तथा इसके अलावा अन्य सभी चीजों को नष्ट हो जाने दें,

सर्वोत्तम तर्क ही आपका मार्ग दर्शन करेगा।

और तर्कःअपनेआप में एक नैतिक पथप्रदर्शक हैः

तर्क ने मुझे ऐसे अनेक काम करने से रोका

जिसके प्रति मैं प्रकृतिवश सहजता से आकर्षित हुआ,

तथा यह मेरे लिए एक शाश्वत हानि होती, यदि मैं जानते हुए भी

झूठ में विश्वास करता या सच को अस्वीकार करता।’

तथा कट्टरपंथ, एक अनिष्टकर आवरणः

धर्म सिद्धांतों के नष्ट होते अवशेषों के बीच

अपने ऊँट पर चढ़े हुए स्काउट ने बांसुरी पर धुनें छेडी

और कहा-यह ऐसे होता है।

यहां चरवाहा अनिष्टकर आवरण से भरा है।

तथा ‘धरती पर दुखों’ के लिए एक दर्दः

‘धरती मुर्दों से भरी है। हवा में सावधानी से चलिए,

ताकि ईश्वर के अनुयायियों के अवशेषों पर आघात न हो।’

ऐसे दयालु कवि की प्रतिमा को सीरिया में आईएस द्वारा नष्ट कर दिया गया। वे हमेशा अतिवादियों/आतंकवादियों के निशाने पर रहे। उन्होंने धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने वालों को रोकने के लिए दयालु/मित्रतापूर्ण इस्लाम का हमेशा समर्थन किया।

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